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गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

माँ का दूध, बच्चे की प्यास !

 बच्चा रो रहा था 

भूख से, 

प्यास से नहीं।  

बोला- माँ भूख लगी है, 

कुछ खिला। 

घर में कुछ  नहीं था 

आज तो रोजी भी नहीं मिली थी,  

रोटी कहाँ से लाती !

कनस्तर पलटा 

थोड़ा आटा आ गिरा 

माँ ने उसे पानी में घोला '

खूब फेंटकर बच्चे को दिया 

बच्चा समझदार था 

जानता था

 यह दूध नहीं 

फिर भी कटोरा पकड़ा 

पी गया गटागट 

मुंह पोछता हुआ माँ से बोला- माँ,

मैं दूध का स्वाद जानता हूँ, 

तूने मुझे खूब पिलाया है,

अपना दूध 

तेरी विवशता समझता हूँ  मैं 

किन्तु, अब मेरी प्यास बुझ गई है 

यह दूध पी कर !


 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

'युवा पौंधा' !

एक  बीज 

पहले बोया गया 

अंकुरित हुआ,

पौंधा बना 

कई साल बाद 

एक पूरा पेड़ 

लहलहाता, हरा भरा 

घमंड से भरपूर 

फल रहे फलों को फेंक देता 

कह कर - मुझ पर बोझ 

बेचारे फल 

पेड़ के तल पर पड़े पड़े 

सूख गए, बिखर गए 

उनके गर्भ में छुपे बीज भी बिखर गए

कुछ लहलहाते पेड़ के सामने 

धरा में समा गए 

वर्षा काल में 

अंकुरित हुए 

पौंधे बने 

फिर पूरे पेड़ 

ठीक, पहले पेड़ की तरह 

किन्तु, तब तक 

वह पेड़  वृद्ध हो चुका था 

जर्जर और क्लांत 

अपने अंतिम समय की ओर बढ़ता 

किन्तु, क्या 

इसे युवा पौंधा समझ पायेगा !

रविवार, 28 दिसंबर 2025

प्रकृति में नकारात्मकता !

जब आकाश से वर्षा हुई

इसे आकाश का रुदन बताया 

जब मेघों की गर्जना हुई 

इसे मेघों का क्रुद्ध गर्जन बताया 

जब सूर्य देव तीव्र ताप से चमके  

इसे सूर्य की अग्निवर्षा कहा 

जब आँधी चली 

तब कहा वायु देव क्रोधित हैं 

जब भूकंप आया 

कहा- धरती रुष्ट कि पाप बढ़ चले 

अरे, निर्विकार प्रकृति में इतनी 

विकृति ढूँढने वालों 

प्रकृति में प्रतिबिम्ब न देखो !

शनिवार, 1 नवंबर 2025

'मौन"

सुनो,

मौन का स्वर 

मौन 

सहमति है.

मौन 

सहनशीलता है

मौन

व्यक्ति का निरीक्षण है 

मौन में सब समाहित 

इसे निर्बल न समझो 

मौन 

मेघों का नाद है 

मौन 

असहमति का स्वर भी है 

मौन

सहनशीलता की परख है 

मौन 

परीक्षण है 

मौन को समझो 

मौन निर्बल नहीं, शक्ति है. 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

कोई नहीं करता

लड़की ने लडके से कहा- 

तुम मुझे कितना प्यार करते हो ? 

 लड़के ने कहा - उतना---!

उत्सुक लड़की ने टोका - बोलो न कितना ! 

लड़का बोला - उतना कोई नहीं करता। 

लड़की ख़ुशी से उछल पड़ी

लड़का भी खुश 

बुदबुदाया -

कोई नहीं करता !

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

हाथ नहीं छोड़ते.

 घर के छज्जे पर खड़े 

देखा है मैंने 

वृद्ध दंपति को एक दूसरे का हाथ पकड़े 

टहलते हुए 

बातचीत करते 

खिलखिलाते, मुस्कराते 

कभी वह बहस करते 

वृद्ध क्रुद्ध होता 

दोनों के मुख पर तनाव होता 

किन्तु तब भी दोनों 

हाथ नहीं छोड़ते. 

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

जैसे छाया

 मैंने अपने परम मित्र से कहा- 

तुम मेरे साथी हो 

सुख दुख के 

संघर्ष और विजय के 

हम दोनों शरीर और छाया जैसे है। 

पर यह क्या! 

अब वह साथ नहीं चलते 

पीछा करते है 

जैसे छाया !


मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

वर्षा से चिंतित माँ!

घनघोर वर्षा 

कड़कती बिजली 

गर्जन करते मेघ 

सब जल- थल 

मैं माँ के पास बैठ जाता 

माँ चिन्तित दृष्टि बाहर डालती 

मेघ आच्छादित आकाश देखती 

मैं समझ नहीं पाता

माँ इतनी चिन्तित क्यों! 

हम तो घर में है सुरक्षित 

चिन्ता की बात क्या 

तभी छत टपकने लगी 

टपाक! 

एक बूँद मेरे सर पर बजी 

अब मैं समझ गया था। 

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

मैं गिद्ध



उन्नत पर्वत शिखर पर बैठा वृद्ध गिद्ध 

अब, घिस चुकी चोंच को नुकीला करेगा 

पर्वत से घिस घिस कर 

अपने नख तोड़ देगा 

स्वयं को शिखर से लुढ़का देगा 

ताकि क्लांत पंखों को नया जन्म दिया जा सके 

इसके बाद, उसका पुनर्जन्म होगा 

वह पुनः वृद्ध से युवा गिद्ध बन जायेगा 

मैं भी गिद्ध हूँ 

वृद्ध शिथिल शरीर हूँ 

किन्तु, क्लांत नहीं 

मैं शिखर पर पहुँच कर 

अपने शिथिल शरीर का पुनर्निर्माण करूंगा 

नख घिसूंगा 

स्वयं को शिखर से लुढ़का कर 

नए पंखों को जन्म दूंगा 

ऊंची उड़ान भरने के लिए। 

शनिवार, 30 अगस्त 2025

सब कुछ समाप्त!

 जब वर्षा हो रही होती है

पक्षियों का कलरव बंद हो जाता है 

वह सहम जाते हैं 

 दुबक जाते है 

जब बादल गरजता हैं 

बिजली कड़कती है 

बच्चे माँ की गोद मे सिमट जाते है 

सभी घोंसले मे छुप हो जाते हैं 

अब वृक्ष  अछा लेगा 

कि तभी 

जोरदार बिजली कड़कती है 

बादल गर्जना करते है 

बिजली गिरती है 

सीधा वृक्ष पर 

सब कुछ समाप्त ।


शुक्रवार, 20 जून 2025

शब्द चित्र!

 शब्द चित्र 

कैसे बनते हैं ? 

एकाधिक शब्दों और वाक्यों का सम्मिलन 

प्रभावशाली ढंग से !

तो 

इसे कोई भी बना सकता है 

इतना सरल है 

शब्द चित्र का निर्माण ! 

नहीं, कदापि नहीं 

शब्द चित्र इतने सरलीकृत नहीं 

यदि अनुभव और संवेदना का मिश्रण नहीं !

मंगलवार, 17 जून 2025

कुत्ता था !


एक आदमी और कुत्ता 

चले जा रहे थे - साथ साथ 

कुत्ते के गले मे पट्टा था 

उसकी जंजीर आदमी के हाथ में थी 

आदमी नौकर था 

कुत्ते को टहलाने लाया था 

दोनों ही सोच रहे थे 

कुत्ता सोच रहा है 

यह आदमी कितना अच्छा है 

मुझे टहलाता है 

मेरी टट्टी साफ करता है 

मुझे नहलाता धुलाता भी है 

उसी समय आदमी ने सोचा -

इस कुत्ते के कारण मुझे काम मिला है 

अच्छा पैसा मिलता है 

इसे  मेरी और मुझे इसकी जरुरत है 

इसलिए 

मालिक चाहे मर जाए 

किन्तु यह कुत्ता न मरे 

आदमी की सोच  कुत्ते तक पहुँच गई थी शायद !

इसलिए

कुत्ता घर पहुँच कर मालिक से  चिपट गया 

नौकर की तरफ मुड़ कर नहीं देखा 

कुत्ता स्वामिभक्त था !

रविवार, 8 जून 2025

कबूतर उड़!

 




कबूतर

प्रेम का कबूतर 

कबूतरी

प्रेम की प्रेमिका 

दोनों दुनिया से अलग 

प्रेम प्यार मे डूबे रहते 

एक दिन

कबूतरी ने अंडा दिया 

प्रेम और अपने ऑयरन के अंश को 

वह सेने लगी 

दिन भर बैठी रहती

इस से ऊब ने लगा कबूतर 

उड़ चला

प्रेम की खोज में। 

गुरुवार, 5 जून 2025

पेड और सूख गया!

धूप सर चढ़ आई थी

 

भूख लगने लगी थी

 

उसने खाने की पोटली निकाली

 

पानी की तलाश में इधर उधर दृष्टि डाली

 

न पानी था, न छाया थी

 

एक सूखा पेड़ खड़ा था उदास

 

वह पेड़ की लंबी छाया के आश्रय मे बैठ गया

 

सूखा पेड़ खुश हो गया

 

भूखा खाता रहा

 

खाना खा कर

 

फिर पानी की तलाश मे इधर इधर देखा

 

निराश हो कर

 

ढेर सा थूक इकट्ठा कर पी गया

 

उदास पेड़ और सूख गया।

मंगलवार, 3 जून 2025

पिता, पिता नहीं होता!

पिता

 

पीटता है 

 

इसलिए पिता नहीं होता।

 

पिता

 

पालता है!

 

तो इससे क्या होता है।

 

पिता

 

तुम्हारे प्रत्येक सुख दुख सहता है!

 

इससे क्या होता है?

 

यह प्रत्येक पिता करता है।

 

तो,

 

पिता केवल पिता होता है!

बुधवार, 21 मई 2025

बूँद !


एक बूँद ऊपर उठी

 

उठती चली गई  

 

दूसरी बूँद भी उठी और उठती चली गई

 

उठती चली गई

 

इसके बाद...एक के बाद एक

 

ढेरो बूँदें ऊपर उठती चली गई

 

आसमान की गोद में मिली

 

नृत्य करने लगी -

 

हम उड़ रही है

 

एकत्र हो कर दूजे का हाथ थामे

 

आसमान विजित करने  

 

बूंदे मिलती गई

 

एक दूजे में सिमटती गई

 

घनी होती गई

 

और अब ...

 

अपने ही बोझ से

 

नीचे गिरने लगी

 

फिर  बिखरने लगी

 

अपने मूल स्वरुप में आकर

 

पृथ्वी पर बरसने लगी

 

और बन गई तालाब

 

आसमान छूने जा रही बूंदों को

 

अब प्रतीक्षा है

 

सूर्य की तपिश की

 

ताकि बन सके एक  बूँद  . 

....रोया न था !



आसमान घिरने लगा

 

बदल एकत्र होने लगे

 

मिल कर साथ घने होते चले गए

 

नीचे होते गए...और नीचे

 

आसमान से दूर

 

गिरते चले गए

 

यकायक पृथ्वी से कुछ दूर

 

बरसने लगे

 

आसमान साफ होने लगा

 

आसमान सोचने लगा

 

मुझसे दूर जा कर

 

बदल क्यों रोने लगे ?

 

वह समझ न सका !

 

वह  कभी रोया न था !

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

तनाव

जब तनाव अधिक होता है न 

तब गाता हूँ 

रोता नहीं 

पड़ोसी बोलते हैं- 

गा रहा है 

मस्ती में है 

तनाव उनको होता है 

मुझे तनाव नहीं होता। 

पाती नहीं आती !

अब चिट्ठी नहीं आती 

किसी स्व-जन की कुशल पाती नहीं आती 

उन की कठिनाइयों, अभाव से अवगत नहीं हो पाता 

अब मेल आती है 

जिनसे मेल नहीं उनकी!

फोन आते हैं 

जिन्हें कभी देखा नहीं 

स्वर से सूरत का मिलान नहीं हो पाता 

अपरिचित स्वर सुनाई देते है 

जिसमें विनम्रता होती है, अपनत्व नहीं 

अब अपने कहाँ 

हमने तो इन्हें अतीत मे भेज दिया 

अब उनकी भी मेल ही आती है 

पाती नहीं आती ।

शनिवार, 28 सितंबर 2024

मैं, तुम हूँ!

 


तुम मुझे भूल गए क्या?

मैं सदैव तुम्हारा साथ देता था 

तुम्हारा सहारा था 

सुख में 

दुख मे 

संघर्ष काल में 

उबरने की  छटपटाहट मे 

हाथ थाम लेता था 

तुम सदैव विजित रहे 

मेरे कारण 

तुम मुझे भूल गए! 

मैं 

तुम हूँ 

तुम्हारा अतीत 

तुम भूल गया क्या?

उठो, चल पड़ो!

माँ का दूध, बच्चे की प्यास !

  बच्चा रो रहा था  भूख से,  प्यास से नहीं।   बोला- माँ भूख लगी है,  कुछ खिला।  घर में कुछ  नहीं था  आज तो रोजी भी नहीं मिली थी,   रोटी कहाँ ...