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शनिवार, 1 अगस्त 2026

एलियन एलांस और चरवाहा बच्चे !

नन्हा एलियन भटक  रहा था इधर उधर ! रात का अँधेरा। उसे कुछ सूझ नहीं  रहा था। सोच रहा था- यह कहाँ छूट गया मैं। 

रात कुछ एलियन अपने यान में घूम रहे थे।  पृथ्वी का एक टुकड़ा बिंदु बिंदु जगमगा रहा था। बड़ा अनूठा दृश्य था।  उन्हें इसे निकट से देखना रोचक लगा।

उन्होंने अपना यान नीच उतारा। बिंदु इधर उधर भाग रहे थे।  यह कैसा चमत्कार !

वास्तव में, वह जगमगाते बिंदु, जुगनू थे।  हिलती डुलती आकृतियों को देख कर, जुगनू  भागने लगे थे।  एलियन इसे चमत्कार समझ रहे थे। 

उस एलियन झुण्ड में, एक छोटा एलियन भी था।  दो फुट का।  वह भाग रहे जुगनुओं को पकड़ने उनके पीछे भागने लगा।  वह उन्हें पकड़ कर अपने ग्रह में ले जाना चाहता था।  

पृथ्वी पर यह अनूठा दृश्य देख कर मुग्ध एलियंस को समय का ध्यान ही नहीं रहा।  सुबह होने को थी।  उन्हें सूरज की पहले किरण से पहले ही पृथ्वी को छोड़ देना था। पृथ्वी के प्राणी, उनसे भयभीत हो  कर,उन्हें हानि  पहुंचा सकते थे। 

सभी एलियंस  जल्दी जल्दी अपने यान की ओर भागने लगे। और अपने  यान में घुस गए। 

अंदर जा कर  उन्हें पता चला कि छोटा एलियन नहीं है। उन्होंने यान में उसे खोजा। किन्तु, छोटा एलियन कहीं  नहीं था। 

दो तीन बड़े एलियन यान से नीचे उतर कर छोटे एलियन को खोजने लगे।  वह उसे पुकार  रहे  थे - एलांस एलांस ! तुम कहा हो !

किन्तु, एलांस बहुत दूर निकल गया था। वह जुगनुओं के पीछे भागता  चला जा रहा था। उसे अपने पिता भाई की आवाज तक नहीं सुनाई दे रही थी ।  

सूरज की पहली किरण फूटने वाली थी। यह एलियंस के लिए संकटपूर्ण होता।  इसलिए, निराश एलियंस वापस यान में चले गए। यान अंतरिक्ष की ओर उड़ चला। 

लाल लाल सूरज को सामने देख कर छोटा एलियन सहम गया।  यह नीचे से ऊपर उठती आकृति क्या है ? उसे समझ नहीं आ रहा था। वह भागता हुआ एक घने पेड़ के नीचे बैठ गया। 

वह चरवाहों का एक गाँव था।  चरवाहे, गाय, बकरी  और भेड़ें पालते थे। इन पशुओं का दूध बेच कर वह अपना जीवन यापन करते थे।   भेड़ों की ऊन से, वह स्वयं और अपने परिवार के लिए सर्दियों के कपडे बना लिया करते थे। ऊन  बचने पर उनसे बने वस्त्र बेच कर भी गुजारा किया जाता था। 

चरवाहों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे।  क्योंकि,  आसपास कोई विद्यालय था भी नहीं।  उनके बच्चे दिन भर खेलते कूदते रहते थे। इसलिए उन्हें पशुओं को  चराने का काम सौंप दिया गया था।  यह काम चरवाहा बच्चों को भी खूब पसंद आया था।  क्योंकि, इससे उन्हें खूब खेलने और पास के  पेड़ों पर लगे फलों को खाने का अवसर भी मिल जाता था। 

चरवाहा बच्चों ने पेड़ के नीचे बैठे एलियंस बच्चे को देखा।  वह थोड़ा भयभीत हुए।  गाये रम्भाने लगी। भेड़  बकरियां भी चिल्लाने लगीं। सभी एलियंस बच्चे को घेर कर खड़े थे। 

एलियंस  बच्चे ने, अपने सामने भिन्न और विचित्र आकृतियों वाले जीवों को देखा।  वह डर गया। जोर जोर से रोने लगा।

चरवाहा बच्चों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। हमे देख कर वह क्यों रो रहा था। जबकि, वह खुद उससे डरे हुए थे। वह चकित से उसे देखते रहे। 

ऐसे ही कुछ समय बीत गया । 

चरवाहा बच्चों में एक बड़ा बच्चा समझदार था। वह एलियंस के पास गया। उसने पूछा - तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?

एलियंस को भाषा समझ में  नहीं आई।  वह  चुपचाप उन्हें देखता रहा। इस पर चरवाहा बच्चे क्रोधित हो कर उस पर चिल्लाने लगे।  बड़े बच्चे ने उन्हें शांत कराया।  

उसने फिर अपना सवाल एलियंस के सामने रखा।  तभी एलियंस बच्चे को ध्यान आया कि उसके पास एक ऐसा यन्त्र है, जो किसी भी ध्वनि को उसकी भाषा में परिवर्तित कर सकता है और उसी भाषा में उत्तर भी दे सकता था। उस  ने अपना यन्त्र खोल लिया। 

चरवाहा बच्चे का प्रश्न समझ कर एलियंस ने उत्तर दिया - मेरा नाम एलांस  है। मैं अंतरिक्ष के एलियंस ग्रह से आया हूँ। 

बच्चों को यह पहेली समझ में न आई।  विचित्र नाम एलांस।  एलियंस, अंतरिक्ष और एलियंस ग्रह। यह तमाम शब्द उनकी समझ से बाहर थे। 

फिर भी उन्होंने एलियन से पूछा - तो तुम यहाँ कैसे आये ? तुम्हारे साथ और कौन है ?

एलांस ने उन्हें सब सच बता दिया।

बच्चों को विश्वास नहीं हुआ।  उन्होंने फिर पूछा - हम कैसे मान लें ! क्योंकि, सुदूर अंतरिक्ष में कई जीव रहते है।  कहीं तुम कोई राक्षस तो नहीं !

एलांस सहम कर बोला- नहीं नहीं ! ऐसा नहीं है।  तुम्हारी पृथ्वी के चारों और हजारों ग्रह और नक्षत्र है। लगभग, प्रत्येक ग्रह में कोई न कोई जीव है। मैं भी उनमें से एक हूँ। ठीक तुम लोगो की तरह।  किन्तु, भिन्न आकृति वाला। 

बच्चे मानने को तैयार नहीं थे।  वह बोले - हम कैसे मान लें।  हमने तो पहले कभी ऐसा नहीं देखा सुना।  तुम झूठ बोल रहे हो !

एलांस बोला- तुम्हे मालूम ही क्या है ? क्या तुम जानते हो कि तुम्हारा भारत देश भी चाँद पर अपना यान भेज चुका है।  अब वह एक इंसान को भेजने वाला है।  तुम्हारी पृथ्वी के कई देश सूर्य के निकट जाना चाहते है।  

चरवाहा बच्चे चकित थे। इस बच्चे को हमारी पृथ्वी का इतना ज्ञान ! हम लोग कुछ भी नहीं जानते।  

अब बच्चों ने पूछा- तुम अब अपने घर कैसे वापस जाओगे? क्या तुम्हारे लोग तुम्हे लेने वापस आ सकते है? 

एलांस बोला - सूरज डूबने के बाद, वह मुझे ढूंढने वापस आएंगे।  किन्तु यहाँ आएंगे, मैं कह नहीं सकता। क्योंकि, हम लोग जहाँ उतरे थे, मैं उस जगह से काफी दूर आ चुका हूँ।

बच्चों ने एलांस को आश्वस्त किया- तुम घबराओ नहीं।  हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे।  तुम्हे को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।  

एलांस आश्वस्त हुआ।  बोला- धन्यवाद मित्रों।  

बड़े बच्चे ने पूछा- तुम्हे भूख लगी होगी ! क्या खाते हो तुम लोग ?

एलांस ने बताया- हम लोग जब अंतरिक्ष की सैर को निकलते है, तब अपना भोजन एक कैप्सूल में परिवर्तित कर रख लेते है।  मेरे पास ऐसे बहुत से कैप्सूल है।  मैं उन्हें ही खाऊंगा। 

सभी बच्चों को भूख लग आई थी। सभी ने, अपनी पोटली से खाना निकलना शुरू कर दिया।  वह सभी, एलांस के साथ, उसी पेड़ के  नीचे खाने लगे। एलांस ने भी अपना एक कैप्सूल  खा लिया।  

शाम होने को थी।  बच्चों ने आपस में बात की।  उन्हें वापस घर जाना होगा।  किन्तु, एलांस को अकेला नहीं छोड़ सकते।  इस पर सभी बच्चों ने निर्णय किया कि कुछ बच्चे पशुओं के साथ वापस जायेंगे।  वह अपने बड़ों को सब बता कर, वापस आ जायेंगे। 

एलांस जब तक वापस नहीं जा पाता, सभी बच्चे उसके साथ ही रहेंगे। 

जब गाँव में बड़ों को मालूम हुआ तो वह भी चरागाह में आ गए।  उन्होंने एलांस को देखा। विचित्र और आकर्षक जीव लगा।  उन्होंने सोचा - हम इस जीव को पकड़ कर सरकार को सौंप देंगे। इससे उन्हें बढ़िया इनाम मिलेगा। 

यह जान कर एलांस रोने लगा।  चरवाहे बच्चे उसके चारों और एकत्र हो गए।  उन्होंने, उसे शांत रहने को कहा। 

सभी बच्चों ने, अपने बड़ों का  विरोध किया।  उन्होंने कहा- एलांस हमारी तरह ही किसी का बच्चा है।  वह हमारा मित्र भी है। किसी दूसरे ग्रह  से आये मित्र को हम नुकसान होने नहीं  दे सकते।  हम लोग इसे, इसके लोगों को सौंप कर ही घर वापस आएंगे।  

बड़े निराश हो कर चले गए। 

सभी बच्चों ने पूरी रात एलांस के छूटने वाली जगह ढूंढने का निर्णय किया। वह चारों ओर फ़ैल गए।  वह जोर जोर से एलांस एलांस चिल्ला रहे थे।  ताकि, एलांस के माता पिता इसे सुन कर उनके पास आ जाएँ।  

इसका फल शीघ्र मिल गया।  एलियंस, अपने यान में बैठ कर एलांस को खोजने आये थे। उन्होंने आवाज सुनी।  वह नीचे उतरे।  बच्चे उन्हें लेकर एलांस के पास आये। 

अपने माँ पिता को देख कर  एलांस उनसे लिपट गया।  सभी एलियंस बहुत खुश हुए। 

एलांस ने अपने लोगों को सभी बातें बता दी।  वह चरवाहा बच्चों की इस परोपकारी भावना से बहुत खुश हुए।  उन्होंने सभी चरवाहा बच्चों को अपने यान में बैठा कर अंतरिक्ष की सैर कराई।  जाते समय उन्होंने सभी बच्चों को सुन्दर उपहार दिए।  

चरवाहा बच्चों ने, दौड़ दौड़ कर कुछ जुगनू पकड़े।  उन्हें एक बोतल में रख कर एलांस को भेंट किया।  एलांस बहुत खुश हुआ। 

अब दो ग्रहों के निवासी परस्पर अच्छे मित्र बन गए थे। 


छुटकी! का हाथी

छुटकी ने अभी अभी ड्रॉइंग क्लास जॉइन की थी. रेखाओं को मिलाते हुए चित्र बनाना उसे भाता था. वह  अपनी स्टडी टेबल पर बैठ कर सादे कागज पर रेखाएं खींचती रहती थी। 

उसके इस प्रयास को माँ और पिता ने देखा। उन्हें लगा कि छुटकी ड्राइंग सीखना चाहती है।  कला किसी भी बच्चे में सकरात्मक भाव पैदा करती है।  उसमे कुछ करने की भावना पैदा करती है। 

उन्होंने छुटकी से पूछा - बिटिया, क्या तुम्हे ड्राइंग बनाना पसंद है ? क्या तुम ड्राइंग सीखना चाहोगी ? तुम्हारा ड्राइंग स्कूल में एडमिशन करा दें। 

 छुटकी न  सहमति में सर हिलाया।  इस  के बाद, छुटकी का एक ड्राइंग स्कूल में एडमिशन करवा दिया गया था। 

छुटकी क्लास के बाद, घर आ कर अपनी मेज पर बैठ गयी . उसने ड्रॉइंग पेपर निकाला. पेंसिल को नुकीला बनाया. तभी सटीक चित्र बन सकता था. 

 छुटकी, ड्राइंग क्लास से  वापस आने के बाद अपनी मेज पर बैठ गई। उसने ड्रॉर से अपना ड्राइंग बॉक्स निकला।  बॉक्स में भिन्न प्रकार की पेन्सिलें थी।  ड्राइंग के लिए यह बहुत आवश्यक है।  साथ में इरेज़र और शार्पनर भी था। बारह इंच और छह इंच की पटरियां भी मेज पर सजा दी।  

अब छुटकी ने सफेद ड्रॉइंग पेपर पर काली पेंसिल से रेखाएं बनानी शुरू कर दी। वह एक रेखा के साथ दूसरी  रेखा को बनाती। उसने निरंतर, एक रेखा बनाई .उसके निकट दूसरी रेखाएं बनाई. फिर दो रेखाओं तीसरी रेखा से उन्हें मिलाना प्रारंभ कर दिया. वह एक रेखा से जोड़ते हुए दूसरी रेखा खींचने लगी। उसका यह प्रयास देर तक चलता रहा। 

जब उसे लगा कि आकृति पूरी हो गई है तब उसने कागज अपनी आँखों के सामने रखा । हाँ, यह हाथी ही था।  अर्थात, उसका हाथी बन गया था। 

छुटकी देर तक अपनी  बनाई आकृति देखती रही। वह स्वयं पर मुग्ध सी थी। मैंने अभी सीखना शुरू किया है। किन्तु, कितनी अच्छी आर्ट  बना लेती हूँ मैं! वह आकृति को देर तक देखती रही।  

यकायक, छुटकी को लगा आकृति हिल रही है। उसकी बनाई आकृति आकार लेने लगी थी। उसमे त्रिआयाम दिखने लगे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई सजीव आकृति हिल रही थी। 

यह देख कर छुटकी ने घबरा गई। उसने अपनी आँखे बंद कर ली।  यह कैसा भ्रम ! वह सोच रही थी। 

तभी उसे प्रतीत हुआ कि उसकी मेज पर कोई बैठा है। कौन हो सकता है !

छुटकी ने धीरे धीरे आँखे खोली।  मेज पर कोई अनगढ़ आकृति बैठी हुई थी। वह हिल रही थी। बड़ा सा सर हिला डुला रही थी।

यह देख कर छुटकी की चींख निकल गई- अरे यह क्या ! तुम कौन हो ! 

इस पर आकृति बोली - मैं तुम्हारा हाथी हूँ छुटकी ! अभी अभी ही तो तुमने मुझे कागज पर उकेरा था।  

छुटकी  घबड़ा गई - तुम... और हाथी ! किसने बनाया  तुम्हे ! क्या मैंने ! हाथी तो ऐसा नहीं होता है। तुम्हारा शरीर चारों तरफ से नुकीला है। सूंड, कान, पैर और पूँछ नुकीली है। पूरा शरीर बेडौल और टेढ़ा-मेढ़ा है। 

हाथी बोला - हाँ ! तुम सही कह रही हो। लेकिन मैं हाथी ही हूँ। तुम्हारा  बनाया हुआ हाथी।  अभी ही तो तुमने अपनी नन्ही उँगलियों से मुझे ड्राइंग पेपर पर उकेरा था। 

छुटकी के आंसू निकल आये।  वह सोचने लगी -यह हाथी है! मैंने  ऐसा हाथी बनाया ! हाथी कहीं ऐसा होता है ! कितनी ख़राब ड्राइंग है मेरी !

छुटकी की आँखों से आंसू टपा-टप गिरने लगे। 

हाथी चौंक पड़ा। उसने सूंड उठा हलकी हवा छुटकी तरफ छोड़ी।  बोला - तुम रो क्यों रही हो ? क्या  मैं इतना बुरा हूँ ? किन्तु, मैं तो तुम्हारा हाथी हूँ। तुम्हारी रचना। 

छुटकी, उदास स्वर में बोली - तुम इतने बुरे नहीं हो।  मेरी ड्राइंग बुरी है। मैंने तुम्हे कितना बुरा गढ़ा है। हाथी जैसे लग ही नहीं रहे। जगह जगह से कोने निकले हुए है। कान, सूंड और पैर  नोकदार है। ईश्वर का बनाया हाथी कहीं ऐसा होता है। मैं सचमुच बुरी आर्टिस्ट हूँ !

हाथी, ठहाका मार कर हंसा। छुटकी चकित सी उसे देखती रही।  फिर बोली - तुम हंस क्यों रहे हो? मैंने कितनी बुरी  ड्राइंग बनाई  है, इस पर !

हाथी, गंभीर हो कर बोला - नहीं, तुम्हारी रचना पर नहीं।  तुम्हारी ड्राइंग बुरी नहीं है।   तुमने अभी ड्राइंग सीखना शुरू किया है।  तुम अभी बहुत छोटी भी हो।  तुम्हारे हाथों में अभी वह सफाई और नियंत्रण नहीं है।  कोई भी रचना अभ्यास के साथ सुगढ़ बनती है। तुम प्रयास और अभ्यास करती रहो। मुझे तुम सुगढ़ हाथी बना दोगी। 

बस तुम्हे करना इतना है कि पहले आँखे बंद कर मेरा ध्यान करो। मैं वास्तव में कैसा लगता हूँ, उसे सोचो।  फिर उसके अनुसार पेंसिल से आउटलाइन बनाना शुरू करो।  सर और शरीर का अनुपात, पैरों की मोटाई और नाखूनों का आकार, पूँछ की लम्बाई और कान का सूप आकर, सब अपने ध्यान में लाओ। मेरी आँखे  शरीर के अनुपात में काफी छोटी होती है। ध्यान रखना। तुम कुछ प्रयास के बाद, अच्छा चित्र बनाने लगोगी। 

छुटकी हाथी की बातें ध्यान से सुन रही थी।  वह आश्वस्त लग रही थी कि वह निरंतर प्रयास और कल्पनाशीलता से अच्छी आकृतियां गढ़ सकती है।  

छुटकी को संतुष्ट  देख कर हाथी बोला - अच्छा छुटकी, अब मैं तुम्हारी आकृति बनने जा रहा हूँ।  तुम फिर प्रयास करती रहना।  मैं फिर मिलूंगा।  

हाथी ड्राइंग पेपर में समा गया।  

छटकी ने, पेंसिल नुकीली बनाई।  इरेज़र उठाया। आकृति को सुगढ़ हाथी बनाने में जुट गई।  

Chutki!'s Elephant


Chutki had just joined a drawing class. She loved drawing by joining lines. She would sit at her study table and draw lines on plain paper.

 

 

 

Her mother and father noticed her efforts and felt that Chutki wanted to learn drawing. Art creates positive emotions in any child. It instils a sense of accomplishment.

 

 

 

They asked Chutki, "Daughter, do you like drawing? Would you like to learn drawing? Let's enrol you in a drawing school."

 

 

 

Chutki nodded in agreement. After this, Chutki was enrolled in a drawing school.

 

 

 

After class, Chutki came home and sat at her desk. She took out the drawing paper and sharpened her pencil. Only then could she create a precise drawing.

 

 

 

After returning from drawing class, Chutki sat at her desk. She took out her drawing box from the drawer. The box contained different types of pencils. These are essential for drawing. An eraser and a sharpener were also included. Twelve-inch and six-inch rulers were also arranged on the table.

 

 

 

Chutki began drawing lines with a black pencil on the white drawing paper. She followed one line with another. She drew a line continuously, then another next to it. Then she began connecting two lines with a third. She began drawing another line, connecting one line with another. This effort continued for a long time.

 

 

 

When she felt the shape was complete, she held the paper in front of her eyes. Yes, it was an elephant. In other words, her elephant had been created.

 

 

 

Chutki stared at her drawing for a long time, fascinated by herself. "I've just started learning. But what a wonderful art I create!" She stared at the shape for a long time.

 

 

 

Suddenly, Chhutki felt the shape move. The shape she had drawn began to take shape. It began to appear three-dimensional. It seemed as if some living figure was moving.

 

 

 

Chhutki was frightened by this. She closed her eyes. What kind of illusion is this? She wondered.

 

 

 

Just then she realized that someone was sitting at her table. Who could it be?

 

 

 

Chhutki slowly opened her eyes. A shapeless figure was sitting on the table. It was moving. It was shaking its big head.

 

 

 

Seeing this, Chhutki screamed, "Hey, what is this? Who are you?"

 

 

 

The figure said, "I am your elephant, Chhutki! You just drew me on paper."

 

 

 

Chhutki panicked, "You... and an elephant! Who made you? Did I? An elephant is not like this. Your body is pointed all over. Your trunk, ears, legs, and tail are pointed. Your entire body is misshapen and crooked."

 

 

 

The elephant said, "Yes! You're right." But I am an elephant. An elephant you made. You just drew me on drawing paper with your tiny fingers.

 

 

 

Chhutki burst into tears. She thought, "This is an elephant! I made such an elephant! Does an elephant ever look like this? What a terrible drawing I have!"

 

 

 

Tears began to fall from Chhutki's eyes.

 

 

 

The elephant was startled. He lifted his trunk and blew a light breeze towards Chhutki. He said, "Why are you crying? Am I that bad? But I am your elephant. Your creation."

 

 

 

Chhutki said in a sad voice, "You're not that bad. My drawing is bad. I have sculpted you so badly. You do not even look like an elephant. There are corners sticking out in places. Your ears, trunk, and feet are pointed. Is there an elephant made by God like this? I am a bad artist!"

 

 

 

The elephant burst out laughing. Chhutki looked at him, astonished. Then she said, "Why are you laughing?" On how badly I have drawn!

 

 

 

The elephant, becoming serious, said, "No, not on your drawing. Your drawing is not bad. You have just started learning to draw. You are still very young. Your hands do not have the precision and control. Any design becomes refined with practice. Keep trying and practicing. You will make me into a fine elephant."

 

 

 

All you must do is close your eyes and contemplate me. Imagine what I look like. Then start drawing the outline with a pencil. Consider the proportions of the head and body, the thickness of the legs and the shape of the nails, the length of the tail, and the shape of the ears. My eyes are quite small in proportion to my body. Keep that in mind. With some practice, you'll start drawing well."

 

 

 

Chutki was listening intently to the elephant. She seemed confident that with continued effort and imagination, she could create good figures.

 

 

 

Seeing Chhutki satisfied, the elephant said, "Okay, Chhutki, now I'm going to draw your figure. You keep trying. I'll see you again."

 

 

 

The elephant disappeared into the drawing paper.

 

 

 

Chutki sharpened her pencil, picked up her eraser, and set about shaping the figure into a well-shaped elephant.

सोमवार, 28 जुलाई 2025

इकन्नी !



रात काफी  गहरी हो चली थी।  मैं पैदल ही घर की ओर चल  पड़ा।  यद्यपि, मेरी जेब में घर तक जाने  के लिए पर्याप्त पैसा था।  किन्तु, मैं पैदल ही क्यों चल पड़ा था ! रिक्शा क्यों नहीं पकड़ा मैंने?


मैं उस समय १२-१४ साल का रहा होऊंगा। आठवी कक्षा में पढ़ रहा था।  सरकारी स्कूल में दाखिला था। इसलिए  फीस कम थी।  किन्तु, अन्य अभाव तो थे ही। कभी खाने पीने की चीज़ का । कभी जूतों कपड़ों का। 


पिताजी को पेंशन मिलती थी। उससे सात  जनों के परिवार का गुजारा कैसे होता! अभाव तो बना ही रहता था।  किसी न किसी वस्तु की।  यह अभाव मुझे बहुत सालता था।  मैं किसी न किसी प्रकार से पैसे बचाने या बनाने की जुगत में रहता।


यह आदत मेरी स्कूल में भी थी।  माँ, मुझे इंटरवल में लैया चना खाने के लिए  इकन्नी  दिया करती थी। वह मेरी हाफ निक्कर की जेब में पड़ी रहती।  इंटरवल होता।  मैं खोमचे के पास आता।  तमाम बच्चे  खोमचे को घेरे अपनी लैया चने की पुड़िया का इंतज़ार करते।  पुड़िया मिलते ही खुशी खुशी खाने लगते। 


मैं उन्हें खड़ा देखता रहता।  मन ललचाता।  सोचता एक पुड़िया ले कर खा ही लूँ। किन्तु, मैं खोमचे तक जाने की हिम्मत ही नहीं कर पाता।  इकन्नी, मेरी जेब में हाथ की  उँगलियों के बीच गोल गोल घूमती रहती।  यह सिलसिला तब तक चलता, जब तक इंटरवल ख़त्म होने की घंटी न बज जाती।  मैं चैन की सांस लेता क्लास की ओऱ बढ़ जाता। अब मैं कैसे खा सकता था ! 


मैं आज भी, जेब में एक रुपये का सिक्का डाले चला जा रहा था।  सीतापुर बस स्टैंड से कब डालीगंज पार हो गया पता ही नहीं चला। क्यों? है न सोचने में बड़ी शक्ति होती है!  समय और दूरी का पता ही नहीं चलता।  कितना कदम, कितना मील,  कितना समय, कितने दिन हफ्ते और महीने साल गुजर जाते है!


गोमती पर बना डालीगंज का पुराना पुल पार हो गया।  अब मेरा दिल सहम गया था।  दिल का सहमना उस आसन्न भय के कारण था, जो कुछ कदम चलने के बाद, कुछ मिनटों में आना था। 


उस समय, लखनऊ का यह क्षेत्र इतना भरापूरा नहीं हुआ करता था।  पुल के बाद, दोनों तरफ खेतों की शृंखला थी। इन खेतों में अधिकतर सब्जियां उगाई जाती थी।  यह ताजा सब्जियां, उखाड़ कर  किसानों द्वारा रकाबगंज सब्जी मंडी में बेचीं जाती थी।  हम लोगों को अच्छी ताजा सब्जी सस्ते में मिल जाया करती थी।


किन्तु, इन खेतों के कारण रात बड़ी  डरावनी हो जाया करती थी। इतनी रात को कोई इधर से नहीं गुजरता था।  लोग  कहते थे कि यहाँ रात में चोर डकैत छुपे रहते हैं और  लूटपाट करते है।  किन्तु, मैं तो इस डरावनी रात में भी गुजर रहा था!


होता यह था कि हमारे घर में एक सज्जन आया करते थे। सीतापुर में उनकी फ्लोर मिल थी।  उसके काम के सिलसिले में उन्हें लखनऊ आना होता था।  वह जब भी लखनऊ आते, हमारे घर जरूर आते। देर शाम,वह बस पकड़ने निकलते तो मुझे ले लेते।  बस में बैठने के बाद वह मुझे रिक्शा के लिए एक रूपया थमा देते। कभी फिल्म देखने के बहाने भी पैसे दे देते थे । मैं फिल्म देखने का बड़ा शौक़ीन था।  वह इस बात को अच्छी तरह से जानते थे।  कभी फिल्म देखने साथ ले भी जाते।


खेतों के बीच से गुजरती सड़क पर मैं तेज कदमों से चला जा रहा था।  डाकुओं का डर भी था और एक रुपया छिन जाने का भी।  मार देंगे इसका भय उतना नहीं था।  एक छोटे बच्चे कोई कौन डकैत मारेगा !


सहसा मैं एक कुत्ता ऊंची आवाज में रोया।  उसकी आवाज बंद होती, इससे पहले ही सिटी स्टेशन से चलने की तैयारी कर रही ट्रेन के इंजन ने सीटी बजाई। इन दोनों आवाजों ने मेरे शरीर में भय का संचार कर दिया।  मैं लगभग काँप उठा।  तेज तेज कदमों से चलने लगा। थोड़ा चैन तब आया, जब सिटी स्टेशन पर पहुँच गया।  अब घर नजदीक था। मैं खुश था कि मैंने एक रुपया बचा लिया था।


इंटरवल ख़त्म हो जाता तो मैं क्लास में पढ़ने लगता।  पूरा समय सोचता रहता कि आज मैंने इकन्नी बचा ली।  माँ को दे दूंगा।  घर खर्च में काम आएंगी।


घर पहुँच कर मैंने बस्ता किनारे रखा। माँ ने मुझे देखा तो पूछा- आज पढ़ाई कैसी हुई?


मैंने जवाब दिया - ठीक। 


फिर मैंने निक्कर की जेब में हाथ डाला।  इकन्नी निकाल कर माँ के हाथ में रख दी।


माँ ने हथेली में इकन्नी देखी। माँ  बिलख पड़ी - खरूंड़ा इकन्नी भी नहीं खर्च कर पाया तू।



मैं चुप रहा ।


रात घर पहुंचा।  माँ मेरी प्रतीक्षा कर रही थी।  मैंने उनके पास जा कर एक रुपये का सिक्का उन्हें थमा दिया।  माँ  बोली - रिक्शा क्यों नहीं कर लिया बेटा? 


मैं इस बार भी चुप रहा। 

सोमवार, 14 जुलाई 2025

कही कोई किसी के बच्चे के लिए ऐसे कहता है !




कभी अतीत के पृष्ठ पलटो तो कुछ खट्टी, कुछ मीठी यादें कौंध जाती है। जीवन है।  समाज है।  हेलमेल। आना जाना। सम्बन्ध है। क्रिया प्रतिक्रिया होती रहती है।  इस प्रक्रिया में कुछ ऐसे अनुभव हो ही जाते है।





हम ऎसी कुछ स्मृतियाँ याद रखते हैं। कुछ बिसार दिया जाना चाहते  हैं। कुछ ऐसे अनुभव होते हैं, जिन्हे पुनः पुनः स्मरण करना बड़ा भला लगता है।  कुछ को विस्मृत कर देने का मन करता है।






किन्तु, इस अनुभव को क्या कहें ? क्या इन्हे भुला दिया जाए या याद रखा जाये ! यह मेरा निजी अनुभव या जिया हुआ क्षण नहीं है।इसे मुझे बताया गया। मेरी माँ ने बताया।  अपना अनुभव।  जिसे मैंने अनुभव किया।






मैं अपने इस अनुभव को एक कथा के रूप में आपके समक्ष रखता हूँ। कदाचित इस प्रकार से आप सुनना या पढ़ना चाहेंगे। स्मृतियों या विस्मृतियों का इतना आकर्षण नहीं, जितना कथा का होता है।






कथा एक माँ और उसके बच्चे की है।






बच्चा कोई बड़ा नहीं। अबोध शिशु।  कठिनाई से कुछ महीने का होगा।  माँ के आँचल में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करने वाला। पूरा पूरा दिन, माँ के साथ खेलता, किलकारी भरता और रोता -खाता !






हुआ यह कि उस अबोध बालक के मूत्र थैली के निकट एक लाल दाना सा उभरा।  माँ ने नहलाते समय उसे साफ़ किया।  फिर कुछ लगा दिया।





कुछ दिन ठीक।  अचानक फिर उभरा।  इसे के बाद, एक के बाद एक कई दाने उभरते चले गए। वह लाल दाने फैलते गए।  दर्द करने वाले बन गए। बालक दर्द से बिलखता।  माँ उससे अधिक बिलख जाती।





घरेलु ईलाज से कोई लाभ न होता देख कर, माँ उसे डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने जांच की।  पाया कि यह एक्जिमा था।  डॉक्टर ने दवा लिख दी।  किन्तु, दवा से कोई लाभ नहीं हुआ।  एक्जिमा पूरे शरीर में फैलता चला गया। एक समय ऐसा आया कि अबोध शिशु का पूरा बदन सड़ गया।  माँ उसको हाथ में उठती तो खाल हाथ में आ जाती।  माँ बच्चे की इस दशा पर रो पड़ती। बच्चे का रुदन माँ को एक पल भी चैन न लेने देता।





पैसे कम थे।  निजी चिकित्सक को दिखाना संभव नहीं हो पा रहा था। उस पर दवा से लाभ भी नहीं हो रहा था। इसलिए, माँ ने बच्चे को मेडिकल कॉलेज दिखाने का निर्णय लिया। कुछ शुभचिंतकों ने बताया भी था कि मेडिकल कॉलेज में स्किन डिपार्टमेंट बहुत अच्छा है। सटीक ईलाज हो जायेगा। कोई पैसा भी नहीं देना पड़ेगा।  सब निःशुल्क।






मेडिकल कॉलेज घर से दूर था।  पैसे की कमी थी। किन्तु, माँ को इसकी चिंता नहीं थी।  उसे अपने बच्चे को किसी भी प्रकार से ठीक करना ही था।  इसलिए वह उसे हाथों के बीच रख कर मेडिकल कॉलेज निकल पड़ी।






जैसा कि बताया कि पैसे की कमी थी। घर से मेडिकल कॉलेज पांच किलोमीटर से अधिक दूर था। रिक्शा पर ले जाना खर्चीला था। किन्तु, माँ को इससे कोई सरोकार नहीं था। उसे तो बस मेडिकल कॉलेज जाना ही थी।





माँ ने बच्चे को एक बारीक कपडे से ढका और पैदल ही निकल पड़ी मेडिकल कॉलेज की ओर। कड़ी धुप थी। सड़क तप रही थी। माँ पसीना पसीना हो रही थी।  किन्तु, उसे किंचित भी कष्ट अनुभव नहीं हो रहा था। पर वह उस समय बिलख उठती, जब बच्चा धुप की गर्मी से बेचैन हो कर रोने लगता। माँ उसे सीने से लगा कर कहती - बेटा बस पहुँच ही रहे है।





अस्पताल में लम्बी लाइन थी।  डॉक्टर के कमरे के बाहर लम्बी लाइन लगी थी।  माँ परचा बनवा कर लम्बी लाइन में खडी हो गई।





कुछ औरतों ने देखा।  पूछा - किसे दिखाने आई हो ?





अपने बेटे को - माँ ने संक्षिप्त उत्तर दिया।





औरतों में उत्सुकता बढ़ी।  एक गोद के बच्चे को एक्जिमा !!!





 देखें ज़रा।  माँ ने कपड़ा हटा दिया।





औरतें चीख उठी।  बच्चे के सड़े हुए चेहरे के बीच केवल दो काली काली आँखे जीवंत दिखाई दे रही थी।  अत्यंत वीभत्स दृश्य था।





औरते स्तब्ध। बिलख उठी।  बच्चा रो पड़ा।





औरतें हाथ जोड़े, आकाश की ओर देख कर कह रही थी - हाय हाय ऎसी औलाद देने से अच्छा होता यदि न ही देता।





माँ ने क्रोधित  दृष्टि से उन्हें भस्म कर देना चाहा।  औरतें सहम कर हट गई।




                               X                   X              X

कहानी अब ख़त्म।





इसके आगे क्या! बच्चा आज भी जीवित है।  माँ की उम्र से बड़ा हो गया है। किन्तु, माँ स्वर्गवासी हो चुकी है।





बच्चे ने माँ के दुःख को उनके मुंह से सुना है।  एक बार नही बार बार सुना है। माँ का ऐसा दुखद  अनुभव! इसे अनुभव कर ही वह बिलख उठता है।  सहम जाता है। उद्विग्न हो जाता है।





कही कोई किसी के बच्चे के लिए ऐसे कहता है !

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

१ जुलाई १९५३

१ जुलाई १९५३। भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न सन्दर्भ। किसी के लिए यह मात्र एक तिथि माह या सन। संभव है कि कई लोग इस तिथि की महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर दृष्टिपात करना चाहें। करते भी है।





किन्तु मेरे लिए यह महत्वपूर्ण है। इस लिए कि सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इस तिथि को मेरा जन्म हुआ था। इसी तिथि के अनुसार मुझे सेवा निवृत होना था। ३० जून २०१३ को। क्या मैं सेवानिवृत हुआयह किसी और समय पर हल करने वाला प्रश्न है।




मैं, सरकारी सेवा पुस्तिका का अनुसार, १ जुलाई १९५३ को जन्मा था।  यद्यपि, यह पूर्ण सत्य नहीं था। कारण यह कि हम लोगों के समय में घर आकर पढ़ाने वाले मास्टर ही विद्यालय में प्रवेश दिलाते थे।  उन्होंने ही, ७ जुलाई को स्कूल खुलने की तिथि के आधार पर ही मेरी जन्मतिथि १ जुलाई १९५३ लिखवा दी थी।  कहते हैं की कि उस समय बच्चों के स्कूल में भर्ती होने की आयु ५ या छह साल से कम नहीं होनी चाहिए थी। इसलिए १ जुलाई १९५३ मेरी जन्मतिथि मान ली गई। किसी जन्मकुंडली की आवश्यकता नहीं पड़ी।




इस जन्मतिथि की यात्रा, स्कूल की टीसी से निकल कर, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और फिर प्रतियोगिता परीक्षा से होती हुई, सरकारी सेवा अभिलेखों में पसर गई। मैं प्रत्येक १ जुलाई को इसी तिथि पर बड़ा होता चला गया। और एक दिन सेवानिवृत भी होना था। अर्थात ३० जून १९१३ को।




किन्तु, झोल यहाँ है।




एक दिन मैं पुराने कागज पत्र टटोल रहा था।  पुराने कागजों को देखते हुए, मुझे एक कागज के टुकड़े में पिता की लिखाई दिखाई पड़ी। उत्सुकतावश मैंने उसे उठा लिया।




मैंने उसमे लिखा पढ़ा तो मैं चौंक गया। अरे, मेरी जन्मतिथि तो गलत दर्ज हुई है। पिता की लिखाई के अनुसार मेरा जन्म १ जुलाई १९५३ नहीं, १७ जुलाई १९५१ को हुआ था। अर्थात मैं आज ७२ साल का पूरा हो कर ७३वें में नहीं, ७४ साल पूरा हो कर, ७५वे प्रवेश करने में १५ दिन पूर्व की तिथि में था।





मैंने आगे पढ़ा तो मालूम हुआ कि १७ जुलाई १९५१ को बुद्धवार के दिन मैं जन्मा था। मैंने इसका फैक्ट चेक किया। इसके अनुसार, १७ जुलाई १९५१ को, बुद्धवार नहीं, मंगलवार था।  अर्थात पिताजी गलत थे। उन्होंने १७ जुलाई १९५१ को दिन बुद्धवार होना बताया था। १७ जुलाई १९५१ की तिथि याद रखने वाले पिता जी दिन के लिखने में असफल साबित हो रहे थे।





अब मैंने अपनी सरकारी जन्मतिथि १ जुलाई १९५३ के दिन का फैक्टचेक किया। इस तारीख़ को बुद्धवार था। मैंने सोचा। सोचा क्या तय ही कर लिया कि पिताजी ने तिथि १७ और सन गलत लिखा।  जुलाई उनको ठीक याद रहा। किन्तु, दिन भी गलत लिख गए।  




पिताजी ने तीन तीन गलतियां की थी। तिथि सन और दिन की।  जबकि, मेरी सरकारी अभिलेखों में लिखी १ जुलाई १९५३ की तिथि मंगलवार होने के कारण सही थी।





इस प्रकार से, मेरी जन्मतिथि के मामले में मास्टर, सरकारी दस्तावेज और मैं सही साबित हुए। पिता गलत।  

शनिवार, 28 सितंबर 2024

शायद मैं थक गया हूँ!

 


पैर उठते नहीं 

शरीर को सहन नहीं कर पा रहे 

शायद मैं थक गया हूँ 

मस्तिष्क साथ नहीं दे रहा 

अंग किसी की नहीं सुन रहे 

शायद मैं थक गया हूँ 

अतीत बहुत याद आता है 

वर्तमान मुझे सताता है 

शायद मैं थक गया हूँ!

Alien Alans and Shepherd Children!

 The tiny alien was wandering aimlessly in the darkness of the night. He couldn't understand anything. He was wondering, "Where did...