रविवार, 1 मई 2011

चुभन

दिन की चुभन कुछ ऎसी होती है,
कि चाँद की चांदनी भी सताया करती है।
हम रात भर करवटे बदलते हैं,
कि ख्वाबों की ताबीर सताया करती है।
इंसानों ने इस कदर बदला खुद को,
मौसम ने बदलना छोड़ दिया है ।
इंसानों की फितरत है कुछ ऎसी
कि फलों ने महकना छोड़ दिया है।

माँ का दूध, बच्चे की प्यास !

  बच्चा रो रहा था  भूख से,  प्यास से नहीं।   बोला- माँ भूख लगी है,  कुछ खिला।  घर में कुछ  नहीं था  आज तो रोजी भी नहीं मिली थी,   रोटी कहाँ ...