शनिवार, 1 अगस्त 2026

गरीब सोहन !



दो मित्र थे . सोहन और मोहन. दोनों में घनिष्ठ मित्रता थी. दोनों ही एक ही स्कूल में, एक ही कक्षा में पढ़ते थे.





किन्तु, उनमे एक विषमता थी. सोहन निर्धन परिवार से था, जबकि मोहन का परिवार काफी धनी था.  स्कूल में दूसरे अमीर  छात्र भी थे. किन्तु, मोहन ने सोहन से ही मित्रता की. 





सोहन को सरकार के शिक्षा का अधिकार कानून के कारण इस विद्यालय में प्रवेश मिला था . किन्तु, प्रवेश मात्र से कुछ नहीं होता. प्रवेश लेने के बाद यूनिफार्म, पुस्तके और दूसरे खर्चे भी होते थे. उन्हें वहन करना सोहन के पिता के लिए संभव नहीं था. 






स्कूल में, सोहन की फीस तो माफ़ थी. किन्तु, पुस्तकें और यूनिफार्म तो खरीदनी पड़ती थी. उसमे कोई कुछ नहीं कर सकता था. छात्रवृत्ति मिल जाये तो संभव है. 




सोहन के पिता ने, जान पहचान के, पूर्व की कक्षा के छात्रों से पुस्तकें मांग ली थी. सोहन को साधारण कपडे से बनी स्कूल ड्रेस भी मिल गई थी. किन्तु, उससे उसका काफी मजाक बनता था.





सहपाठी चिढाते कि सरकार की दया से एडमिशन तो करवा लिया. किन्तु, किताबों और ड्रेस के लिए पैसे कौन देगा. देखो कितना पुराना बस्ता है. किताबे भी पुरानी और उधडी हुई जिल्द वाली है. स्कूल बैग भी रंग खो चुका है. स्कूल यूनिफार्म भी मांगे की लगती है. 





उस स्कूल में, सप्ताह के एक दिन, सभी छात्र अपने पसंद की पोशाक पहन सकते थे. सभी छात्र इस छूट का पूरा पूरा लाभ उठाते। सभी छात्र महंगे और नए नए वस्त्र पहन कर आते थे. यहाँ तक कि मोहन भी महंगे वस्त्र पहन कर आता. केवल सोहन ही अपवाद था. 





सोहन के लिए यह दिन बड़ा खराब गुजरता था. उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह महंगे कपडे पहन सकता. वह अधिकतर या तो स्कूल यूनिफार्म में आता या पुराने या मांगे गए कपडे पहन कर. यह वस्त्र भी किसी भी प्रकार से मोहन सहित स्कूल के अमीर बच्चों के बराबर के तो नहीं ही होते थे.





सोहन समझदार बच्चा था. वह सहपाठियों के ताने सुनता, अपने कपड़ों का मजाक समझता। वह सब सुनता. उसे बुरा भी लगता. किन्तु, सदैव मुस्कुराता रहता. वह कर भी क्या सकता था!





सोहन ने कभी अपने पिता से इसकी शिकायत नहीं की. वह उन्हें आर्थिक कठिनाई के इस समय में उन्हें मानसिक कष्ट नहीं देना चाहता था.





मोहन, यह सब देखा और सुना करता था. उसे सोहन के पुराने कपड़ों पर दया नहीं आती थी. बल्कि, उसे सोहन पर  सहपाठियों के तानों का बुरा लगता. वह कहता- "हम लोग अमीर हो तो क्या हुआ ? हम महंगे कपडे पहन सकते हैं. किन्तु, सोहन गरीब है. उसके पिता के पास हमारे पिताओं जितना धन नहीं है. इसलिए वह बढ़िया और महंगे कपडे नहीं पहन सकता. किन्तु, वह है तो हमारा साथी. हमें उसकी गरीबी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए.





"हम लोग यहाँ पढ़ने आये हैं. सोहन की पढ़ाई देखो. वह पढ़ने में तेज है. हमसे बहुत आगे रहता है. हमें उसकी बुद्धिमत्ता का सम्मान करना चाहिए."





किन्तु, कोई मोहन की बात नहीं सुनता. सभी उसकी खिल्ली उड़ाते.





हताश हो कर, मोहन ने एक दिन सोहन से कहा- मित्र, सभी लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ाते है. क्या तुम्हे बुरा नहीं लगता? यदि तुम बुरा न मानो तो मैं तुम्हे अच्छे कपडे खरीद कर दे सकता हूँ. इस प्रकार से तुम भी हम लोगों की तरह स्कूल आ सकते हो.




सोहन ने रूखे स्वर में कहा- नहीं मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है. मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ. अपनी मांगे की अमीरी दिखाने नहीं. तुम मेरे लिए दुखी मत हो मित्र.





इसके बाद भी सोहन का मजाक उड़ाया जाना बंद नहीं हुआ.





यह बात विद्यालय के प्रधानाध्यापक तक पहुंची. उन्होंने सोहन को अपने कमरे में बुला कर पूछताछ की. इन्होने सोहन से उसको चिढाने वाले बच्चों के नाम बताने के लिए कहा. सोहन ने साफ़ मना कर दिया. उसने कहा- महोदय, मैं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता. मैं यहाँ केवल पढ़ने आया हूँ. मुझे किसी की शिकायत नहीं करनी.





कुछ महीनो बाद.





एक दिन प्रधानाध्यापक ने, सभी बच्चों को विद्यालय के सभागार में बुलाया. जब सभी बच्चे वहां एकत्र हो गए, तब प्रधानाचार्य सभा कक्ष के मंच पर पहुंचे. उन्होंने सोहन को मंच पर बुलाया.




इसके बाद, उन्होंने कहा- मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूँ.





उन्होंने सोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- "मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि सोहन ने आज परीक्षा में विद्यालय पर शीर्ष स्थान प्राप्त किया है. उसके अधिकतर विषयों में ९८ प्रतिशत या इससे कहीं अधिक अंक है. क्या तुम लोग बता सकते हो कि तुम्हे कितना अंक मिले है? सोहन के अंकों के बराबर तो किसी के अंक भी नहीं है. तुम में से अधिकतर ७८ प्रतिशत से अधिक अंक नहीं ला पाए हो."





उन्होंने गर्व के साथ सर ऊंचा करते हुए कहा- "सोहन पढ़ने में तेज है, इसकी विशेषता केवल यह नहीं. वह बहुत जिम्मेदार और समझदार बच्चा है. क्या तुम लोग जानते हो कि वह स्कूल के बाद क्या करता है?





सभी बच्चों पर एक दृष्टि डालने के बाद, कुछ रुक कर प्रधानाचार्य बोले – सोहन विद्यालय से निकल कर एक दूकान पर जाता है. वह इस दूकान में रात आठ बजे तक काम करता है. इसके बाद, घर पहुँच कर वह खाना खाने के बाद कुछ बच्चों को पढ़ाता है. इसके बदले उसे जो पैसे मिलते है, वह उसे अपने माँ और पिता को दे देता है. इस प्रकार से वह अपने घर के खर्चे में अपना योगदान करता है? क्या तुम में से कोई ऐसा करता है?





प्रधानाचार्य ने आगे कहा- एक और रहस्य की बात.इसके बाद सोहन अपनी पढ़ाई करता है. जैसा कि अब तुम जान गए हो कि वह विद्यालय में टॉप पर आया है. किन्तु, इतना ही नही. सोहन जिन बच्चों को पढ़ता है, उन सभी ने अपने विद्यालयों में टॉप किया है. क्या तुम में से किसी ने ऐसा किया है?






सभी छात्र लज्जित से चुप थे. प्रधानाचार्य ने सोहन को एक ट्राफी और नकद ईनाम दे कर सम्मानित किया. उन्होंने उसे अपने गले से लगा लिया.





सभी बच्चे तालियाँ बजा रहे थे. मोहन अपने मित्र सोहन को गर्व से देख रहा था.

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