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शनिवार, 1 अगस्त 2026

जंगल मे साक्षरता- क्रांति !

साक्षरता की बयार जंगल मे भी बह चली थी।

 

वनराज शेर के आदेश थे कि सभी पशु पक्षियों को अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय भेजना होगा। उन्होंने पूरी शिक्षा व्यवस्था निःशुल्क कर दी थी। इसलिये कोई पशु या पक्षी गरीब होने का बहाना नहीं कर सकता था। सभी को बिना किसी प्रजाति के भेदभाव के, विद्यालय में पढ़ना और पढ़ाया जाना ही था।

 

इस का परिणाम बहुत अच्छा रहा।  जंगल की साक्षरता शतप्रतिशत गई।  भारत देश के केरल राज्य की तरह। पढ़े लिखे युवाओं की फ़ौज जंगल पहाड़ झाड़ियों में देखी जा सकती थी.

 

जैसा कि होता है, साक्षरता के बाद परिवर्तन की हवा बहने लगती है। नए विचार दिमाग में आने लगते है. यह विचार सबसे उपयुक्त भी लगते हैं. साक्षर वन में भी वैचारिक परिवर्तन की हवा बहने लगी। युवा पशु पक्षी बात  करने लगे। बात पहले दो मित्रों  में होती।  फिर मित्रों के जमावड़े में होती।  ऐसा करते करते, यह हवा पूरे पशु समाज और वन-राज्य में फ़ैल गई।

 

युवाओं के तर्क थे।  वनराज कितने पढ़े हैं? क्या उन्होंने कोई डिग्री प्राप्त कर रखी है? यदि, वह साक्षर नहीं हैं तो वह किस प्रकार से वन पर राज्य कर सकते हैं? हमने कई साल पढ़ाई की है। हम भाषा और विषय भली भाँति जानते है।  क्या वनराज यह सब  जानते है ? तो वह वनराज कैसे बने रह सकते है ?

 

झुण्ड में विचार विमर्श करने के पश्चात् युवा जब अपने घर जाते तो उपरोक्त तमाम प्रश्न उनके मन मस्तिष्क में तैरते रहते।  वह कभी कभी इसे अपने माता पिता या बड़ों के समक्ष उठाते। युवा भालू अपने पिता के सामने गुर्राता - अनपढ़ शेर हमारा राजा क्यों ? शावक भी क्रोध में भरे दांत पीसते।  चिड़िया भीं अब कुछ अधिक कर्कश स्वर निकालने लगी थी।  युवा बन्दर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष इतना अधिक क्रोधित हो कूदते कि कुछ कमजोर डालें टूट भी जाती।  युवा कौवों की कांव कांव भी कुछ अधिक बढ़ चली थी।

 

माता पिता, उन्हें समझाने के प्रयास करते।  किन्तु,युवा बच्चों को समझा नहीं पाते।  उनके अपने  तर्क थे।  पढ़ाई लिखाई की क्या काट हो सकती है भला ! हार कर बड़े-वृद्ध पशु पक्षी  चुप रह जाते।  इससे  युवाओं का जोश दुगुना हो जाता। वह अपने बड़ो को निरुत्तर जो कर देते थे। 

 

एक दिन युवाओं ने एक बड़ी  सभा की।  लम्बे समय तक भाषण चले। तर्क  वितर्क हुए। लम्बे वार्तालाप का परिणाम एक प्रस्ताव के रूप में सामने आया। 

 

युवा पशुओं ने प्रस्ताव पारित किया - वनराज निरक्षर है।  इसलिए वह गद्दी छोड़ें।  क्योंकि, निरक्षर इतना बड़ा जंगल राज्य चला नहीं सकता।  दूसरे जंगलों से संपर्क के लिए साक्षर होने बहुत आवश्यक है।  संपर्क की समान भाषा आना तो बहुत आवश्यक है।  इसलिए, साक्षर युवाओं में कोई राजा बने और राजा के मंत्रिपरिषद के सदस्य भी। 

 

होते होते यह बात और प्रस्ताव  वनराज तक पहुंचा।  उन्होंने उसे ध्यान से पढ़ा।  अपने महामंत्री भालूमल को बुलाया।  भालूमल को प्रस्ताव दिखाया।

 

भालूमल  प्रस्ताव पढ़ कर मुस्कराये।  बोले - राजन, साक्षरता की हवा बह रही है।

 

वनराज ठहाका लगा कर हँसे - लगता है तुम भी मुझ से छुटकारा पाना  चाहते हो !

 

महामंत्री नतमस्तक होते हुए बोले - राजन, शारीरिक बल और बुद्धिमता में आपका कोई  सानी नहीं।  यह जंगल और उसकी एकता आपके बल पर है। 

 

वनराज ने कहा- युवा बच्चे, पढ़ लिख कर नई जानकारियां हासिल कर चुके है. हम लोगों से, उनके विचारों में अंतर स्वाभाविक है. इसे बिलकुल नकारा नहीं जा सकता. उनके विचार जान कर, उन्हें समझा कर ही कुछ किया जा सकता है.

 

वनराज गंभीर हो कर बोले – फिलहाल, मेरा इसमें बोलना ठीक नहीं। इसलिए आप इस मामले को देखिये।  

 

विशाल राज प्रांगण में सभी को आमंत्रित किया गया। निर्धारित समय से पूर्व ही प्रांगण पशु पक्षियों से ठसाठस भर गया।  पूरे सभागार में कोलाहल मचा हुआ था।  सभी अपनी बात रखने के लिए उत्सुक थे। 

 

निर्धारित समय पर महामंत्री भालूमल मंच पर पहुंचे।  सभी पशु- पक्षियों ने उनका तालियां बजा कर स्वागत किया। 

 

भालूमल ने चारों और एक दृष्टि डालने के बाद कहा - अरे, यहाँ तो पढ़ेलिखे युवा पशुपक्षियों को आमंत्रित किया गया है। तो यहाँ इन युवाओं के अनपढ़ माता पिता क्या कर रहे हैं ?

 

भालूमल  क्रोधित होता हुआ बोला - सभी अनपढ़ पशु-पक्षी यहाँ से निकल जाएँ।  यह पढ़े लिखों की सभा है।

 

इस पर कुछ युवाओं ने विरोध किया - यह हमारे माता पिता हैं।  इन्होने हमें पाला पोषा है। 

 

भालूमल ने प्रतिवाद किया - तो क्या हुआ।  यह पढ़े लिखे तो नहीं है !

 

सभी अनपढ़ पशु पक्षियों को सभा से बाहर जाना पड़ा।  युवाओं को बुरा लगा।  इससे क्षुब्ध कुछ युवाओं ने सभागार का त्याग कर दिया। 

 

महामंत्री ने कहा- यह क्या ? मैंने अनपढ़ों को जाने के लिए कहा। उनके पढ़े लिखे बच्चे क्यों चले गए ?

 

सब निरुत्तर थे।

 

अब भालुमल ने कहना प्रारम्भ किया - आप सब काफी पढ़े लिखे है। किसी ने स्नातक किया होगा तो कोई परास्नातक होगा।  कोई इंजीनियर या डॉक्टर बना होगा। किन्तु, आपमें से कितने हैं, जिन्होंने अध्यापक बनने के लिए पढ़ाई की है ?

 

सभागार में चुप्पी थी।  भालूमल कुछ देर तक सबको देखते रहे।  फिर बोले - क्या आप लोग अपने  बच्चों को पढ़ाना - लिखाना नहीं चाहते ? तो आपमें से किसी ने अध्यापक बनने के लिए पढ़ाई क्यों नहीं की ?

 

युवा स्वयं को लज्जित अनुभव कर रहे थे।

 

भालूमल ने कहा - अब मैं प्रत्येक प्रजाति के शिक्षित युवा से एक प्रश्न पूछूंगा। यह प्रश्न दूसरी प्रजाति के सन्दर्भ में होगा।

 

महामंत्री ने युवा शेर से पूछा - भालू क्या खाता है?

 

उन्होंने - भालू से पूछा - हिरन क्या खाते हैं?

 

भालूमल ने ऊँट से पूछा - बन्दर पेड़ पर क्यों चढ़ा रहता है ? वह क्या खाता है ?

 

उन्होंने बन्दर से पूछा - पक्षियों का भोजन क्या है ? क्या वह मांस खाते हैं ?

 

किसी अन्य प्रजाति के जंतुओं को इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मालूम था।

 

भालूमल ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ वन में शासन के इच्छुक युवा से पूछा - बारिश में जब पूरे वनक्षेत्र में पानी  भर जाता है। आप सभी के भोजन के भोजन  का प्रबंध कैसे करोगे ? अनाज कहाँ से लाओगे ?

 

युवा निरुत्तर था। 

 

उन्होंने एक इंजीनियर बन्दर से पूछा - तुम वृक्षों में निवास करते हो। तुम जलभराव के समय एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग भर कर नदी पार कर सकते हो। किन्तु, जंगल में जलभराव के समय सब नदी कैसे पार करते हैं ?

 

बन्दर बगलें झांकने लगा।

 

महामंत्री ने कहना प्रारम्भ किया – “आप में से किसी के पास भी मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं था। किन्तु, वनराज  से पूछो वह सबके उत्तर जानते हैं। उन्होंने सभी पशुपक्षियों के खानपान, रहन सहन और आदतों के विषय में जानकारी की है।  उन्हें सार्वजनिक जीवन का अनुभव है। वह वर्षा ऋतू से पर्याप्त पूर्व अनाज का भण्डारण कर लेते है.”

 

“एक शासक के लिए आवश्यक होता है कि वह भविष्य को भांप कर योजनाएं बनाये।  वनराज, बारिश से  पहले ही अनाज इत्यादि ऊंची गुफाओं में रखवा लेते है।  बारिश की दशा में उस संरक्षित अनाज से कमा चलाया जा सकता है।

 

“उफनती नदी को बहुत से पशु पार कर सकते है। किन्तु, छोटे पशुओं के लिए यह संभव नहीं। यहाँ गजराज सहयोग करते हैं। वह छोटे पशुओं को अपनी पीठ पर बैठा कर नदी पार ले जाते और वापस  लाते है।  एक सुदृढ़ राज्य के लिए  सहयोग और सहकार बहुत आवश्यक है। 

 

चलते चलते भालूमल ने युवा भीड़ से पूछा - क्या आप लोग बता सकते हैं कि सभागार का मंच ऊंचा और दूर क्यों होता है ?

 

युवा निरुत्तर थे। 

 

भालू ने उत्तर दिया - क्योंकि, मैं तुम सबसे अधिक ज्ञानवान और अनुभवी होने के कारण अलग हूँ । निसंदेह तुम लोग पढ़े लिखे हो।  किन्तु, तुममें अनुभव की कमी है। इसलिए मंच पर नहीं हो। इसके अतिरिक्त मंच से एक दूसरे को अच्छी तरह से देखा जा सकता है।  मनोभावों को भांपा जा सकता है।  इससे व्यक्तिगत सर्वोच्चता और सम्मान की भावना भी आती है।

 

सभी युवा पशु पक्षी कुछ  सोचते विचारते अपने घरों को चले गए।

 

किन्तु, बात यहीं समाप्त नहीं हुई।  इस सभा के बाद, वनराज ने अपनी मंत्री परिषद् में पढ़े लिखे युवाओं को भी पद दिए। किसी को  बाँध, पुल और नाव बनाने का कार्य सौंप दिया। किसी को कृषि विकास सम्बन्धी कार्य सौंप. पशु पक्षी आवास के लिए योजनाये बनाने के आदेश भी दिए. कुछ पढ़े लिखे युवाओं को अध्यापन का प्रशिक्षण भी दिलवाया ताकि भविष्य में अध्यापकों की कमी न हो।

गरीब सोहन !



दो मित्र थे . सोहन और मोहन. दोनों में घनिष्ठ मित्रता थी. दोनों ही एक ही स्कूल में, एक ही कक्षा में पढ़ते थे.





किन्तु, उनमे एक विषमता थी. सोहन निर्धन परिवार से था, जबकि मोहन का परिवार काफी धनी था.  स्कूल में दूसरे अमीर  छात्र भी थे. किन्तु, मोहन ने सोहन से ही मित्रता की. 





सोहन को सरकार के शिक्षा का अधिकार कानून के कारण इस विद्यालय में प्रवेश मिला था . किन्तु, प्रवेश मात्र से कुछ नहीं होता. प्रवेश लेने के बाद यूनिफार्म, पुस्तके और दूसरे खर्चे भी होते थे. उन्हें वहन करना सोहन के पिता के लिए संभव नहीं था. 






स्कूल में, सोहन की फीस तो माफ़ थी. किन्तु, पुस्तकें और यूनिफार्म तो खरीदनी पड़ती थी. उसमे कोई कुछ नहीं कर सकता था. छात्रवृत्ति मिल जाये तो संभव है. 




सोहन के पिता ने, जान पहचान के, पूर्व की कक्षा के छात्रों से पुस्तकें मांग ली थी. सोहन को साधारण कपडे से बनी स्कूल ड्रेस भी मिल गई थी. किन्तु, उससे उसका काफी मजाक बनता था.





सहपाठी चिढाते कि सरकार की दया से एडमिशन तो करवा लिया. किन्तु, किताबों और ड्रेस के लिए पैसे कौन देगा. देखो कितना पुराना बस्ता है. किताबे भी पुरानी और उधडी हुई जिल्द वाली है. स्कूल बैग भी रंग खो चुका है. स्कूल यूनिफार्म भी मांगे की लगती है. 





उस स्कूल में, सप्ताह के एक दिन, सभी छात्र अपने पसंद की पोशाक पहन सकते थे. सभी छात्र इस छूट का पूरा पूरा लाभ उठाते। सभी छात्र महंगे और नए नए वस्त्र पहन कर आते थे. यहाँ तक कि मोहन भी महंगे वस्त्र पहन कर आता. केवल सोहन ही अपवाद था. 





सोहन के लिए यह दिन बड़ा खराब गुजरता था. उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह महंगे कपडे पहन सकता. वह अधिकतर या तो स्कूल यूनिफार्म में आता या पुराने या मांगे गए कपडे पहन कर. यह वस्त्र भी किसी भी प्रकार से मोहन सहित स्कूल के अमीर बच्चों के बराबर के तो नहीं ही होते थे.





सोहन समझदार बच्चा था. वह सहपाठियों के ताने सुनता, अपने कपड़ों का मजाक समझता। वह सब सुनता. उसे बुरा भी लगता. किन्तु, सदैव मुस्कुराता रहता. वह कर भी क्या सकता था!





सोहन ने कभी अपने पिता से इसकी शिकायत नहीं की. वह उन्हें आर्थिक कठिनाई के इस समय में उन्हें मानसिक कष्ट नहीं देना चाहता था.





मोहन, यह सब देखा और सुना करता था. उसे सोहन के पुराने कपड़ों पर दया नहीं आती थी. बल्कि, उसे सोहन पर  सहपाठियों के तानों का बुरा लगता. वह कहता- "हम लोग अमीर हो तो क्या हुआ ? हम महंगे कपडे पहन सकते हैं. किन्तु, सोहन गरीब है. उसके पिता के पास हमारे पिताओं जितना धन नहीं है. इसलिए वह बढ़िया और महंगे कपडे नहीं पहन सकता. किन्तु, वह है तो हमारा साथी. हमें उसकी गरीबी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए.





"हम लोग यहाँ पढ़ने आये हैं. सोहन की पढ़ाई देखो. वह पढ़ने में तेज है. हमसे बहुत आगे रहता है. हमें उसकी बुद्धिमत्ता का सम्मान करना चाहिए."





किन्तु, कोई मोहन की बात नहीं सुनता. सभी उसकी खिल्ली उड़ाते.





हताश हो कर, मोहन ने एक दिन सोहन से कहा- मित्र, सभी लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ाते है. क्या तुम्हे बुरा नहीं लगता? यदि तुम बुरा न मानो तो मैं तुम्हे अच्छे कपडे खरीद कर दे सकता हूँ. इस प्रकार से तुम भी हम लोगों की तरह स्कूल आ सकते हो.




सोहन ने रूखे स्वर में कहा- नहीं मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है. मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ. अपनी मांगे की अमीरी दिखाने नहीं. तुम मेरे लिए दुखी मत हो मित्र.





इसके बाद भी सोहन का मजाक उड़ाया जाना बंद नहीं हुआ.





यह बात विद्यालय के प्रधानाध्यापक तक पहुंची. उन्होंने सोहन को अपने कमरे में बुला कर पूछताछ की. इन्होने सोहन से उसको चिढाने वाले बच्चों के नाम बताने के लिए कहा. सोहन ने साफ़ मना कर दिया. उसने कहा- महोदय, मैं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता. मैं यहाँ केवल पढ़ने आया हूँ. मुझे किसी की शिकायत नहीं करनी.





कुछ महीनो बाद.





एक दिन प्रधानाध्यापक ने, सभी बच्चों को विद्यालय के सभागार में बुलाया. जब सभी बच्चे वहां एकत्र हो गए, तब प्रधानाचार्य सभा कक्ष के मंच पर पहुंचे. उन्होंने सोहन को मंच पर बुलाया.




इसके बाद, उन्होंने कहा- मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूँ.





उन्होंने सोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- "मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि सोहन ने आज परीक्षा में विद्यालय पर शीर्ष स्थान प्राप्त किया है. उसके अधिकतर विषयों में ९८ प्रतिशत या इससे कहीं अधिक अंक है. क्या तुम लोग बता सकते हो कि तुम्हे कितना अंक मिले है? सोहन के अंकों के बराबर तो किसी के अंक भी नहीं है. तुम में से अधिकतर ७८ प्रतिशत से अधिक अंक नहीं ला पाए हो."





उन्होंने गर्व के साथ सर ऊंचा करते हुए कहा- "सोहन पढ़ने में तेज है, इसकी विशेषता केवल यह नहीं. वह बहुत जिम्मेदार और समझदार बच्चा है. क्या तुम लोग जानते हो कि वह स्कूल के बाद क्या करता है?





सभी बच्चों पर एक दृष्टि डालने के बाद, कुछ रुक कर प्रधानाचार्य बोले – सोहन विद्यालय से निकल कर एक दूकान पर जाता है. वह इस दूकान में रात आठ बजे तक काम करता है. इसके बाद, घर पहुँच कर वह खाना खाने के बाद कुछ बच्चों को पढ़ाता है. इसके बदले उसे जो पैसे मिलते है, वह उसे अपने माँ और पिता को दे देता है. इस प्रकार से वह अपने घर के खर्चे में अपना योगदान करता है? क्या तुम में से कोई ऐसा करता है?





प्रधानाचार्य ने आगे कहा- एक और रहस्य की बात.इसके बाद सोहन अपनी पढ़ाई करता है. जैसा कि अब तुम जान गए हो कि वह विद्यालय में टॉप पर आया है. किन्तु, इतना ही नही. सोहन जिन बच्चों को पढ़ता है, उन सभी ने अपने विद्यालयों में टॉप किया है. क्या तुम में से किसी ने ऐसा किया है?






सभी छात्र लज्जित से चुप थे. प्रधानाचार्य ने सोहन को एक ट्राफी और नकद ईनाम दे कर सम्मानित किया. उन्होंने उसे अपने गले से लगा लिया.





सभी बच्चे तालियाँ बजा रहे थे. मोहन अपने मित्र सोहन को गर्व से देख रहा था.

Alien Alans and Shepherd Children!

 The tiny alien was wandering aimlessly in the darkness of the night. He couldn't understand anything. He was wondering, "Where did...