शनिवार, 25 अगस्त 2012

मुर्दे

मुझे पसंद हैं
मुर्दे !
जो
सोचते नहीं
मुंह खोलते नहीं
वह सांस रोके
निर्जीव आँखों से  देखते हैं
ज़िंदा आदमी का फरेब
जो देखता है,
सब कुछ समझता है
इसके बावजूद
जब
मुंह खोलता है
तब
न जाने कितने
ज़िंदा
मुर्दा हो जाते हैं।
शायद इसीलिए
देखते नहीं
मुंह खोलते नहीं
मुर्दे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. कांडपाल जी , बहुत उम्दा कविता लिखी है आपने मुर्दों पर ...
    आपको पसंद है मुर्दे और मुझे पसंद हैं कविता....

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  2. आपकी देखा-देखी मैंने भी एक ठोक दी ...आपने लिखी मनमोहिनी - मुर्दे पर और मैंने लिखी उसके कोयले पर....फेसबुक से बढ़िया जगह अपनी भड़ास निकालने की भला और कहाँ मिलेगी.....

    जवाब देंहटाएं
  3. आद. श्री काण्डपाल जी,

    आपकी यह कविता दिल को छू गयी...सच कहा है आपने!
    ... हार्दिक बधाई! इसी भाव-विचार के इर्द-गिर्द मैंने भी एक लघुकथा बुनने का प्रयास किया था। शायद आपको रुचिकर लगे। यह रही लिंक-

    http://www.nawya.in/hindi-sahitya/item/%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF.html?category_id=131

    साभिवादन
    जेजे

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