बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

मनहूस पेड़

मैंने देखा
एक सूखे पेड़ पर
उल्लू बैठे हुए हैं.
भयानक आवाजें करते
आस पास के लोगों
राहगीरों को डराते
पेड़ की किसी साख पर
किसी पक्षी  को नहीं बैठने देते.
इससे चकित हो कर
मैंने पूछ ही लिया-
तुम लोग इस पेड़ पर
कई दिनों से बैठे हो
कहीं और जाते नहीं
सबको डराते हो
पक्षियों को बैठने नहीं देते
वातावरण में मनहूसियत भर गई है.
उल्लू भयानक आवाज़ करते एक साथ बोले-
यह पेड़ कभी हरा भरा था
इसमें फूल खिलते थे
फल लगते थे
पक्षी इस पर बैठ कर
आनंदित हो कर चहकना चाहते
इसके फल चखना चाहते
राहगीर इसकी छाया में आराम करना चाहते
अपनी दिन भर की थकान उतारना चाहते
गाँव के बच्चे
इस पर चढ़ना चाहते
इसका झूला बनाना चाहते
इसके चारों और खेलना चाहते
इसके फल चखना चाहते
लेकिन
यह मनहूस पेड़
उन्हें पास नहीं फटकने देता
अपनी  शाखाओं  को
भयानक तरीके  से हिला कर आवाज़ करता,
लोगों को डरा देता
इस ने  गाँव के बच्चों को कभी
खुद पर बैठने नहीं दिया,
झूला झूलने नहीं दिया
यह उन्हें अपनी  डाल हिला कर
गिरा कर घायल कर देता
लोगों ने डर कर
इसके पास आना बंद कर दिया
इसे मनहूस समझ लिया
इस प्रकार
अकेला पड़ गया यह पेड़
एक दिन सूख गया.
जिस पेड़ ने
अपने हरे भरे रहते
किसी को अपनाया नहीं
कुछ दिया नहीं
उस पर हम न बैठे तो कौन बैठेगा.

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