मंगलवार, 1 नवंबर 2011

अर्जुन

यह शब्द
तब तक हमारे हैं
जब तक यह
मुंह के तरकश से निकल कर
जिव्हा की कमान से छोड़े नहीं जाते
लेकिन यह तब
घातक हो जाते हैं,
जब अनियंत्रित और खतरनाक तरीके से
सामने वाले पर छोड़े जाते हैं
उस समय इनसे घायल हो कर
न जाने कितने भीष्म पितामह
इच्छा मृत्यु की बाट जोहते हैं
लेकिन तब भी
घमंड भरा अर्जुन
अपने  गाँडीव का रक्त पोंछता हुआ
अगले कुरुक्षेत्र की 
तैयार में जुट जाता है.
 

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