गुरुवार, 8 सितंबर 2011

काश


आसमान पर
 ऊंचे, ऊंचे और बहुत  ऊंचे उड़ते हुए
पंछियों को
कोई कुछ नहीं कहता.
मगर लोग मुझसे कहते हैं-
 बहुत उड़ रहे हो,
इतना ऊंचा न उड़ो
 नहीं तो गिर जाओगे.
जंगल में स्वछन्द विचरते
कूदते फांदते पशुओं को
कोई मना नहीं करता
 पर
लोग मुझसे क्यूँ कहते हैं
इतना स्वछन्द क्यूँ विचरते हो
अपनी ज़िम्मेदारी समझो,
इतनी लापरवाही ठीक नहीं .
ऐसे में 
मैं सोचता हूँ-
काश मैं
खुले आसमान के नीचे
जंगल में होता.

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