रविवार, 10 जून 2012

कन्या भ्रूण का विलाप (kanya bhroon ka vilaap)

वह
उसे गंदे बदबूदार कूड़े में
खून से सनी हुई ज़िंदगी पड़ी थी।
दूर खड़े ढेरो लोग
नाक से कपड़ा सटाये तमाशा देख रहे थे।
कुछ कमेंट्स कर रहे थे
खास कर औरते-
कौन थी वह निर्मोही!
जिसने बहा दिया इस प्रकार
अपनी कोख के टुकड़े को
नर्क में जाएगी वह दुष्ट !
बोल सकती अगर वह
अब निष्प्राण हो चुकी ज़िंदगी
तो शायद बोलती-
उम्र जीने से पहले मृत्यु दंड पा चुकी हूँ मैं
भोग रही हूँ, कोख से निकाल फेंक कर कूड़े का नर्क
क्या मुझे हक़ नहीं था
माँ की कोख में कुछ दिन रहने का
क्यों नहीं मंजूर थी मेरी ज़िंदगी
जीवांदायिनी माँ को !
क्या इसलिए कि मैं कन्या थी ?
या इसलिए कि मैं उसका पाप थी?
लेकिन कबसे पाप हो गया
कोई जीवन और कोई कन्या?

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