सोमवार, 28 नवंबर 2011

हारने का दर्द लँगड़ाना

यह कविता मैंने अभिव्यक्ति समूह की वाल पर ११ नवम्बर २०११ को लिखी थी. आज ब्लॉग में अंकित कर रहा हूँ.

हारने का दर्द
उसे क्या मालूम
जो कभी
जीता ही नहीं.

यह कविता मैंने १९ नवम्बर को लिखी थी

कभी कभी
लंगड़ाना भी
अच्छा होता है.
आप इच्छाओं की दौड़ में
भाग नहीं ले पाते.


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